शुक्रवार, 14 मार्च 2014

मुझे सुकून घने जंगलों में मिलता है
मैं रास्तों से नहीं मंज़िलों से डरता हूँ।

                                  डॉ.बशीर बद्र

इम्तियाज अली  द्वारा निर्देशित फ़िल्म "हाइवे " जब से देखी  है यही एक शेर दिमाग में चक्कर काट  रहा है।
वीरा (आलिया भट्ट ) का ये कहना कि "तुम जहाँ से मुझे लाये हो वहाँ मैं वापस नहीं जाना चाहती और जहाँ तुम मुझे ले जा रहे हो वहाँ भी नहीं पहुँचना चाहती ,मैं तो बस इस सफ़र में रहना चाहती हूँ क्योंकि ये मुझे अच्छा लग रहा है। "
 मुझे भी सफ़र में रहना अच्छा लगता है और इसी सिलसिले से ढेर  सारे  सफ़र याद  आये…… जून की चिलचिलाती गर्मियों के सफ़र ,सर्दियों की गुनगुनी दोपहरों के सफ़र ,बसंत की  खुशनुमा शामों के सफ़र।
हर सफ़र जिसमें मैं सड़क ,ढाबों ,खेतों और रस्ते के जंगलों से बतियाती चली। हर सफ़र जिसमें मैं गाती -,गुनगुनाती ,हंसती- खिलखिलाती और खुद को भूल जाती चली .
सफ़र हमारे भीतर के हम  को निकलने का मौका देता है क्योंकि मंज़िल पर पहुँच कर हम  वो नहीं रह जाते जो हम  सफ़र में होते हैं। सफ़र में हम  एक दूसरे के बस हमसफर होते हैं और मंज़िल पर पहुंचकर हमसफ़र रिश्तों में बदल जाते हैं और फिर हमें  एक नकलीपन ,एक बनावट घेर लेती है। सफ़र जहाँ हमें धीरे-धीरे से खोलता है वहीं मंज़िलें एकदम से बांध देती हैं। जो सफ़र पर सिर्फ एक यात्री होता  है वही गंतव्य पर पहुंचकर अपने नाम ,अपने पेशे ,अपने धर्म,अपने आर्थिक और सामाजिक तबके का प्रतिनिधि हो जाता है ,गोया के वो वही नहीं रह जाता जो सफ़र पर था।
एक हैरान कर देने वाली बात तो ये है कि मंज़िल का जहाँ इतना गुणगान किया जाता है वहाँ सफ़र पर कोई तवज्जो ही नहीं है। हर कोई एक अनदेखी ,अनजानी (और कभी कभी अनचाही भी ) मंज़िल की  तरफ भाग रहा है और इस भागमभाग में सफ़र की सारी  खुशनुमा नेमतों से बेपरवाह हुआ जा रहा है।
सफ़र का मज़ा तो तब ही लिया जा सकता है जब आँखें  खोलकर चारों  ऒर फैली सुंदरता को जिया जाये … सांसों में जंगली फूलों की ख़ुश्बू भर ली जाये या रस्ते की बेरियों से तोड़कर खट्टे -मीठे बेरों से झोली भर ली जाये या दहकते पलाशों कि टहनियां तोड़कर कुछ अंगारे(पलाश के फूल ) अपने बालों में सजा लिए जाएँ या
चने के खेतों से कुछ बूट चुरा लिए जाएँ या बादलों के झुण्ड देखकर पर फैलाये मोर के साथ अपनी बाहें फैलाकर नाच लिया जाये या किसी ग्रामीण वृद्ध को अपनी कार  में लिफ्ट दे दी जाये … और भी ढेर सारी   सुन्दर चीजें हैं जो सफ़र को एक यादगार सफर बना देती है,पर एक अदृश्य सी मंज़िल पर आँखें गड़ाए हम  सब भागते जा रहे हैं अंधों की  तरह …अपने हमसफ़र से बेख़बर……… अपने आसपास से बेख़बर …अपने होने बेख़बर ,अपने जीने से बेख़बर …………।

तो अब अगली बार जब सफ़र करें …तो ये न कहें…… कि.
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर पे हम  हैं.…?


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